प्रदीप जी से 10 साल बाद 1925 में नीरज जी का जन्म हुआ। स्वाभाविक है दोनों ने स्वतंत्रता से जूझते भारत की आवाज को अंर्तमन से महसूस किया। वह दौर सामाजिक कुरीतियों के करवट लेने का भी दौर था। वही करवटें इन दोनों की कलम से प्रवाहित होकर साहित्य का खजाना बनती गईं। प्रदीप और नीरज जी के गीत आज भी जिंदगी की सच्चाइयों से हम सभी को रूबरू कराते हैं। प्रदीप के ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ व नीरज के ‘कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे’ आज भी ऐसे गीत माने जाते हैं जो पीढ़ियों तक अमर रहेंगे। ये दो गीत तो बानगी हैं इन दोनों गीत ऋषियों की सिद्ध कलम की। दोनों मंचीय कवि थे। ये जिस भी मंच पर होते वहाँ इनके अलावा किसी को सुनने फरमाइश होती ही नहीं थी। लब्बो लुआब यह है कि ये दोनों ईश्वरीय आशीर्वाद के रूप में हिन्दी साहित्य को जगमगाने वाले अवतार थे। इन दो महान गीत ऋषियों पर लिखना शुरू करो तो कलम रुकने का नाम ही नहीं लेती।
Product details
Publisher : Sarv Bhasha Trust (29 April 2024); Sarv Bhasha Trust/8178695606
Hardcover : 174 pages
ISBN-10 : 8197164223
ISBN-13 : 978-8197164224
Reading age : 15 years and up
Country of Origin : India
Packer : Sarv Bhasha Trust
Best Sellers Rank: #428,987 in Books (See Top 100 in Books)
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